Monday, August 2, 2010

प्रेस विज्ञप्ति

New Delhi
दिनांक 2–8–2010

जनवादी लेखक संघ श्री विभूतिनारायण राय द्वारा ‘नया ज्ञानोदय’ पत्रिका (अगस्त 2010 अंक) में दिये उस साक्षात्कार की घोर निंदा करता है जिसमें उन्होंने हिंदी लेखिकाओं के प्रति अपमानजनक और लांछनापूर्ण शब्दों के प्रयोग से अपनी विकृत और कुत्सित मानसिकता का इजहार किया है। इसके साथ ही हम नया ज्ञानोदय के संपादक की भी, इस तरह के महिला विरोधी अभियान चलाने के गैरजिम्मेदाराना कदम के लिए, भत्र्सना करते हैं। छद्म नैतिकता के इन पहरेदारों ने प्रत्यक्षरूप से लेखक और लेखिकाओं के आत्मसम्मान और उनके लेखकीय अधिकार पर कुठाराघात द्वारा अपनी तानाशाही सोच का परिचय दिया है।

जनवादी लेखक संघ की यह मांग है कि केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री केंद्रीय विश्वविद्यालय के एक कुलपति के इस आचरण का नोटिस ले और अविलंब अनुशासनात्मक कार्रवाई करे क्योंकि इस आचरण से उन्होंने महात्मा गांधी के नाम से स्थापित अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की छवि और गरिमा को क्षति पहुंचायी है।
जनवादी लेखक संघ भारतीय ज्ञानपीठ के न्यास से भी मांग करता है कि वह भी ‘नया ज्ञानोदय’ के ऐसे गैरजिम्मेदार संपादक के खिलाफ कार्रवाई करे और विभूतिनारायणराय को ज्ञानपीठ पुरस्कार के निर्णायक मंडल से अलग करे।
जनवादी लेखक संघ यह भी मांग करता है कि लेखक और लोकतांत्रिक समाज से विभूतिनारायण राय और नया ज्ञानादय के संपादक इस निंदनीय आचरण के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगें।


--M.M.P. Singh, Gen. Secretary ; Chanchal Chauhan, Gen.Secretary

7 comments:

Raag Viraag said...

हैरान हूं यह जान कर कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं। किसी व्यक्ति विशेष पर केन्द्रित नही है अत: अभिव्यक्ति की लड़ाई अभिव्यक्ति के माध्यम से ही होनी चाहिए न कि प्रशासनिक।
मैं विभूतिनारायण के विचार से पूर्णत: असहमत हूं, विरोधी भी। परन्तु प्रशासनिक कार्यवाही की मांग लोकतांत्रिक नहीं है।

J M Parakh said...

Main Janvadi Lekhak Sangh ke bayaan se puri tarah sahmat hoon. Loktantrik aacharan ki bhi maryada hoti hai. Loktantra main bhi kisi ko choot nahin di ja sakti ki voh dharm, jati, race, gender ke aadhar par kisi ka bhi apmaan kare. Loktantra main bahas loktantrik maryada main hi ho sakti hai. Gali-galouj aur apmaan ke dwara nahin. Sarvajanik pad par baithe vyaktiyon par yeh jimmedari aayad hoti hai ki veh us pad ki maryada ki raksha kare. Yahan khaas taur par Ravindra kaaliya ke aacharan ki bhi bhartasna karna jaroori hai, jinhone saahitya ke pure mahoul ko bajaaru bana diya hai.Jawarimal Parakh

Raag Viraag said...

पारखजी के विचार में व्यक्त आदर्श उपयोगिता के धरातल पर बेशक महत्वपूर्ण है, परन्तु यहां यह भी जरूरी है कि "लोकतांत्रिक आचरण व मर्यादा" को व्याख्यायित किया जाए साथ ही उसे अनुशासन का स्वरूप देकर पूरी व्यवस्था में प्रभावशाली तरीके से लागू किया जाए।
पूरे साहित्यिक परिवेश को बाज़ार यू भी डस चुका है। एेसे में बाज़ार में घुसे बगैर उसे बदला या ठीक नहीं किया जा सकता। बाज़ार से मुक्त जीवन नहीं है तो रचना कैसे हो सकती है। बाज़ारू होना मूल्यवान नहीं है पर बाज़ार से दूर ब्रह्मराक्षस की तरह किसी कुएं में बैठकर इसे सुधार नहीं सकते।
अंतत: मैं फिर कहूंगा किसी भी व्यक्ति के तथाकथित घृणित विचार से उसके पूरे जीवन की रचनात्मकता, गतिविधियों का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। विचार की लड़ाई विचार के धरातल पर लड़ी जा सकती है। वरना चित्रकार हुसैन, साहित्यकार तसलीमा पर हुए प्रतिक्रिया के पक्ष में खड़े दिखेंगे जिसे मानवीय कभी नहीं कहा जा सकता। किसी भी क्षेत्र में पूर्णकाम होना कोई सहजवृत्ति नहीं है।

भास्कर रौशन said...

मैं "रागविराग" से सहमत हूं।

J M Parakh said...

Vaicharik abhivyakti ko stree jati ke prati gali-galouj ki bhasha ke istemaal se gaddmadd kiya ja raha hai. Main nahin samjhata ki koi bhi swantantrata aisi ho sakti hai jo striyon ko 'chhinaal' kahne ka adhikaar de. Phir jo daliton ko gali dete hain ya honour killing ke naam par hatya ke liye uksaate hain unke virodh aur unke viruddh kanuni karwaie ka kya matlab rah jata hai. Jahan tak M F Hussain aur Taslima nasrin ki baat hai, unhone kya itne ochhepan ke saath dharm vishesh ko apmanit kiya hai. Hussain ke virudh sara abhiyaan communalism se prerit hai. Anyatha unhone hindu mithkon ko apni kala main jagah dekar uska gourav badhaya hai. Isi tarah Taslima Nasrin ne apne hi dharmavalambiyon mein vyapt tatvavaad, ruddhivaad aur strivirodhi nazariye ke virudh sangharsh kiya hai, jiska khamiyaja bhi unhe bhugatana pada hai. Abhivyakti ki azadi ke masle ko is tarah gaddmadd kar ke darasal Hussain aur Taslima Nasrin ko hamle ka nishana banaya ja raha hai.Bazaar me ghuskar hum bazaar ko badal lenge aise dawa karne valon ka hasra kai baar samne aa chuka hai. Is baat ka kya arth hai main nahin janta. Sachchaai yeh hai ki hum chahen ya na chahen hum pujivaadi samaj vyavstha ke hisse hain. Isi arth mein uski rajnitik arthvyavstha ke bhi hisse hain. Kuchh uska labh utha rahe hain aur unse kai guna jyada uske dushparinaam bhog rahe hain. Meri nazar main to jo bazaar main ghusne ki baat karte hain ve darasal us loot ka hissa banane ki ichchha rakhte hain jo punjivadi bazaar muhaiya karaata hai.

भास्कर रौशन said...

किसी भी तथाकथित जाति में एकरूपता नहीं होती। परिप्रेक्ष्य एवं संदर्भ के बगैर व्यंजना का पाठ संभव नहीं है। मैं विभूतिजी द्वारा प्रयोग किए गए इस शब्द की आलोचना एवं भर्त्सना करता हूं, लेकिन इसके अतिरिक्त जो मांग की जा रही है वह प्रतिक्रियात्मक अतिरेक के अलावा कुछ नहीं है।
सर, नज़रिए एक नहीं होते, उनमें विविधताएं होती है। साम्प्रदायिक तत्वादियों, रूढ़िवादियों का नज़रिया एवं लोकतांत्रिक व साम्यवादियों का नज़रिया एक नहीं हो सकता। जिस नज़रिए से आप तस्लीमा नसरीन एवं एम एफ हुसैन को देख रहे हैं सम्प्रदायवादी उसी नज़रिए से नहीं देखेंगे। दरअसल सब निर्भर करता है लक्ष्य पर। क्या रचनाकार के एक शब्द को उसके जीवन, विचार व गतिविधियों का लक्ष्य कहा जा सकता है? शायद ही कोई रचनाकार हो जिसकी कुछ पंक्तियां न खटके। तुलसीदास ने कुछ को "ताड़न" का "अधिकारी" कहा है पर लोकतंत्र की एेसी प्रतिक्रिया तो नहीं हुई कि तुलसीदास की रचना को ध्वस्त कर दिया जाए।
सर, हिमालय के शिखर पर बैठकर बाज़ार नहीं बदला जा सकता है। अगर व्यवस्था में घुसे बगैर उसे बदला जा सकता है तो फिर लोकतंत्र का चुनाव लड़ना, संसद में जाकर आवाज़ बुलंद करना छोड़ दीजिए। अब तक लेनिन से लेकर जिसने भी एेसा किया उसे भी गलत कहिए। सर, इस प्रक्रिया में सफलता या पूर्णता सजह नहीं है। नागार्जन यूं ही नहीं कहते
"जो न हो सके पूर्णकाम, उनको प्रणाम"
सर,आप जिस व्यवस्था के विरूद्ध हैं एवं जिसका दुष्परिणाम भुगत रहे हैं, अपनी टिप्पणी के आरंभ में उसी व्यवस्था के कानून का सहारा लिया है। क्या यह आपकी टिप्प्णी का अंतर्विरोध नहीं है?

!!$$ABHAY$$!! said...

mai J M prakash ji se shat pratishat sehmat hun...

Swatantrata ka matlab yeh nai hota ki nangi nach nachi jaye, logon ke sath gali galauch kiya jaye... aur rehi baat Husain aur Tasleem ji ki abhiyakti par to vah sahi mayno me roodhiwaadion ko khatkegi hi.. kyonki kahin na kahin unka bhi swarth chhupa hua hai.. aur vah swarth kya hai wo jag jaahir hai..

Sarkaar dwara is mudde par uchit kadam uthana hi chahiye..

Rahi baat jo log badi badi batein karten hain system ko system me ghus kar sudharne ki, to mai kehna chahunga ki aise logo ko system me ghus kar usi ka hissa ban jane me jyada der nai lagta...